बुधवार, 2 जुलाई 2025

"अनकहा सा कुछ ..."

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  2001 अगस्त माह की एक सुबह, बाहर बारिश हो रही थी, लेकिन आसमान में चमक थी, जब एक पहाड़ी सुदूर गाँव के सरकारी स्कूल में, कक्षा 10 में एक नई लड़की दाख़िल हुई। शांत चेहरा, लेकिन चेहरे पर चमक।  थकान साफ झलक रही थी,  लेकिन आँखों में गहराई भी थी— जैसे उसने बहुत कुछ देखा हो, बहुत कुछ सहा हो।

सब उसे बड़ी उत्सुकता भरी नजर से देख रहे थे। क्लास टीचर ने सभी को उसका परिचय दिया।।

 ये रश्मि है,

 अब यहीं आपके साथ पढ़ेगी।

अक्सर लड़किया इस उम्र में चुलबुली सी होती हैं, लेकिन वो ऐसे लग रही थी कि जैसे किसी शहर में अपना सबकुछ  छोड़ कर आई हो। 

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 रश्मि को क्लास में बहुत तवज्जो मिली। क्लास के सभी लड़के लड़कियों को उसके प्रति जिज्ञासा थी।  सब उसके बारे में जानना चाह रहे थे, कि शहर से भला इस पहाड़ में कौन पढ़ने आएगा।

वो बहुत शांत रहती, बातें कम करती, बस पढ़ाई पर पूरा ध्यान रहता।  कुछ ही समय बाद वह सबसे घुल मिल गई, सबसे आसानी से दोस्ती भी कर लेती थी।

क्लास में एक लड़का था--  सबसे आगे की बेंच पर बैठता था।

नाम था राहुल।

बहुत ही शर्मीला,  सीधा, शांत, पढ़ने में तेज, अबोध सा दिखने वाला।

उस उम्र से ही डायरी, कविताएं लिखने लग गया था।

रश्मि ने जल्दी ही महसूस कर लिया कि राहुल उसे छुप-छुप कर देखता है। रश्मि उम्र में 1-2 वर्ष बड़ी थी, तो उसके मनोभावों को अच्छे से समझती थी।

राहुल उसे बिना बोले, बिना मुस्कुराए, बस देखता है —

जैसे उसकी आँखों में कोई कविता हो, जो वह कह नहीं पा रहा 

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कई हफ्ते बीते, लेकिन दोनों की कभी आपस में बात नहीं हुई। राहुल की होमवर्क कॉपी सबसे पहले तैयार हो जाती थी जो पूरी क्लास में घूमती रहती।

 रश्मि और राहुल दोनों आपस में एक दूसरे से बातें तो करना चाह रहे थे लेकिन कर नहीं पाए। दोनों की झिझक आपस में मिलने नहीं दे रही थी।

रश्मि को 11-12 वीं के लड़के अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिशें करते। लेकिन उसे राहुल का चुप रहना, और खाली समय अपनी डायरी में कुछ लिखते रहना उत्सुकता पैदा कर रहा था।

उसे अच्छे से पता था कि राहुल उसे पसंद करता है पर बोल नहीं रहा।

अब उसे उसकी चुप्पी बेचैन करने लगी। एक दिन, हिम्मत जुटा कर वह ब्रेक के बाद उसकी सीट पर गई और उससे बिना औपचारिकता व बिना नाम लिए सीधे पूछा--

"तुम्हारी अंग्रेजी की कॉपी मिल सकती है?"

 राहुल ने कुछ नहीं कहा। गर्दन उठा कर उसे देखा! पहले तो वो थोड़ा सकपका गया।  फिर उसने बस अपनी कॉपी उसकी तरफ बढ़ा दी। ये उनकी आमने सामने पहली मुलाकात थी।

उनके बीच पहली बार कुछ साझा हुआ —

"सिर्फ एक कॉपी।"

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जब रश्मि ने कॉपी वापस दी, तो उसके भीतर एक पन्ना छुपा हुआ था।

छोटा सा नोट:

"तुम बहुत शांत रहते हो।

सबकी बातें सुनते हो, खुद कुछ नहीं कहते।

ये तुम्हारी आदत है या कोई बुरा अनुभव?"

"वैसे तुम्हारी हैंडराइटिंग बहुत साफ़ है💐 "--

साथ में रश्मि ने कॉपी में उसका एक सुंदर सा स्केच बनाया हुआ था, जिसमें वो शांत डायरी लिखता हुआ बैठा है।

राहुल ने चिट्ठी बार-बार पढ़ी। उस स्केच को खूब देर तक देखता रहा। उसे आज खुद का चेहरा अच्छा लगने लगा। जीवन में पहली बार खुश होने के मायने उसे समझ आये।  उसे यकीन नहीं हुआ कि ये उसके साथ हो रहा है। वो तो उसे बस देखने भर से खुश था, लेकिन ईश्वर ये क्या चमत्कार कर रहा है।

वो सबको चिल्ला चिल्ला कर बताना चाह रहा था, 

लेकिन शांत रहा;

 कि कोई उस पर भरोसा क्यों करेगा। ऐसी उसमें कोई खूबी दिखती भी नहीं कि कोई इतनी सुंदर लड़की ऐसे खुद से बात करने को आये। जबकि स्कूल के बाकी मैचोमेन टाइप लड़के भी उसे आकर्षित करने को हाथ-पांव मार रहे हो हों।

यही सब सोचकर जवाब देने की हिम्मत उसमें नहीं आ पायी —

उसकी कई रातें यही सोचते निकल गई कि लिखूं भी कि नहीं। और लिखूं तो क्या लिखूं।

यह सोचते-सोचते वे 10वीं पास कर चुके थे।

11वीं के नए नए दिनों में राहुल ने एक दिन हिम्मत करके नई नोटबुक खरीदी।

उसमें एक सुंदर कविता लिखी,  जो उसने उसे पहली बार देखने पर लिखी थी।

 अगले दिन राहुल ने रश्मि को नोटबुक देने का निश्चय कर लिया था।

हाफ-टाइम में भी रश्मि अक्सर अपने डेस्क पर ही बैठा करती थी। उसने चुपके से उसे देखा कि वो वहीं शांत अकेले बैठी है और कुछ ड्राइंग कर रही है।  उसने बिना कुछ कहे, कॉपी चुपके से रश्मि को पकड़ा दी।

 इस एक बरस में पहली बार दोनों की आंखें मिली। राहुल नोटबुक देते हुये कांप रहा था, गला सूखने लगा। बहुत कुछ कहना चाहता था पर एक शब्द न कह पाया।

रश्मि इसके लिए पहले से तैयार थी। कि ये भले देर से दे, पर जवाब जरूर देगा। उसने मुस्कुराते हुए आँखों में चमक लिए उस नोटबुक को पकड़ा। बिना कुछ कहे दोनों ने आंखों में खूब प्यार लिए आंखें नीची कर ली। रश्मि ने जल्दी से कॉपी अपने बैग में रखी, और राहुल जल्दी से बाहर निकल अपने दोस्तों में रम गया।

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इसके बाद अगले दो साल तक, राहुल और रश्मि ने बिना कुछ कहे उस नोटबुक में दुनिया जहान की बातें कर ली।

ना "हाय", ना "हैलो",  ना किसी function में एक साथ कोई तस्वीर।

बस कॉपियों के पन्नों में —पूरे संसार भर की बातें।

उनके हर पत्र में प्रेम नहीं था — सिर्फ समझ, जिज्ञासा, और धीरे-धीरे एक दूसरे के लिए उभरता हुआ स्नेह।

रश्मि कभी उसका मन पूछती, उसकी डायरी की बातें सुनती, तो कभी अपने खोए हुए बचपन की बातें सुनाती।

कभी कभी राहुल बस अपनी कविताएँ भेजता,

कभी बस एक लाइन:

"आज बारिश में तुम्हें सोचते हुए भीग गया।"

और ये कि,...

"ये जो मैं तुम्हारी किताबों में हूँ, ये मेरे हक में भगवान की नेमत है।"

उनका रिश्ता हवा जैसा था — न दिखता, न छूता, पर हर सांस में मौजूद।

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2003 में 12वी की बोर्ड परीक्षा के बाद, रिजल्ट वाले दिन रश्मि स्कूल पहुँची, लेकिन उसे राहुल क्लास में नहीं दिखा।

उसने उसे ढूँढा वो नहीं दिखा, उसने बाहर जाकर देखा कि शायद मुझे परेशान करने के लिए छुपा है कहीं शायद।  पर वो कहीं नहीं मिला। ऐसा लग रहा था कि वो आज इस मौन को गहरे आलिंगन से तोड़कर अपने स्कूल के आखिरी दिन को जीवन भर संजो के रखना चाह रही शायद।

 पर उसे वो आज ही नहीं दिख रहा जब उनकी मौन परीक्षा का आखिरी दिन है। 

वह खामोश  अपनी सीट पर बैठी थी, तभी वहाँ क्लास की अन्य लड़की वर्षा आई, उसने चुपके से रश्मि के कान में फुसफुसा कर कहा --

ये राहुल ने दिया है तुम्हारे लिए”।

रश्मि अवाक सी रह गई कि आजतक राहुल ने उनके इस रिश्ते के बारे में किसी को नहीं बताया, तो आज क्या हुआ कि उसे वर्षा को बताना पड़ा। उसने वर्षा के हाथ से एक पैकेट लिया। और डबडबाई आंखों से वर्षा को एकटक देखती रही। मानों चीख-चीख के कह रही हो कि वो क्यों नहीं आया, कहां है, ठीक तो है। ऐसे कई सवाल वो अपनी गीली आंखों से पूछती रही।

पर जिसने प्रेम में खामोश रहना चुना हो,

उसके हिस्से चुप्पियां ही आएंगी।

स्कूल से आने के बाद उसने वो पैकेट खोला। उसके अंदर खूबसूरत जिल्द में करीने से सजी हुई उनकी पिछले 2 सालों की नोटबुक्स का बंडल। उसने उत्सुकता से आखिरी नोटबुक को खोला, उसमें उसने देखा कि गोल से आईने को कागज पर चिपकाया हुआ और नीचे लिखा था.......

"ये दुनिया की सबसे खूबसूरत और जहीन लड़की की तस्वीर है, इसे संभाल कर रखना।"

 और साथ में नीचे 2 पंक्तियाँ......

"मैंने तुझसे कभी कुछ नहीं कहा, 

लेकिन तुझसे बिना बोले जो जिया

 वो शायद पूरी ज़िंदगी नहीं जी पाऊँ।"

"हम शायद दोबारा ना मिलें। लेकिन तेरी हर चिट्ठी मेरी सबसे प्यारी किताब रहेगी।"

राहुल

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 15  वर्षों बाद...

आज रश्मि एक सरकारी स्कूल में अध्यापिका है। पहाड़ी स्कूल में जब बारिश गिरती है, वह एक चुप मुस्कान लिए अपनी अलमारी में छुपी पुरानी नोटबुक्स निकालती है।

वही पत्र... वही कागज़ों के फूल।

राहुल अब कहाँ है — उसे नहीं पता।

शायद वो शहर चला गया, या किसी और कहानी में खो गया।

लेकिन वो दो साल — वो चिट्ठियों का रिश्ता — हमेशा के लिए उसका रह गया।

"कुछ रिश्ते कहे नहीं जाते — बस चुपचाप लिखे जाते हैं। और फिर पूरी उम्र पढ़े जाते हैं..."

 और उनकी पहली नोटबुक के आखिर पन्ने में लिखा था........

 "गर हम बिछड़े तो तेरी यादों में मिलेंगे,

हमारी यादों के फूल पुरानी किताबों में मिलेंगे।"


" अनकहा सा कुछ ..." ________________________________________   2001 अगस्त माह की एक सुबह , बाहर बारिश हो रही थी , लेकिन आसमान...